हिन्दी की दशा


अभी पिछले सप्ताह मैं 3-4 हिन्दी magazines खरीद कर लाया। इच्छा थी कि कुछ हिन्दी में पढ़ूँ, और जानूँ कि हिन्दी में क्या लिखा जा रहा है। बीच बीच में मुझे ये बुखार चढ़ जाता है। खैर, magazines थीं ये: पाखी, कथादेश, हंस, और “आहा! जिंदगी।” पढ्न शुरू किया दो-तीन दिन की सुस्ती के बाद। उलट-पलट कर देखा तो बड़ी दिक्कत हुई समझने में। फिर लगा की शायद बड़े दिनों से पढ़ा नहीं है, सो जंग लग गयी होगी मेरी भाषा में, सो थोड़ी मेहनत करके पढ़ ही लेता हूँ कुछ। काफी मशक्कत के बाद 3 कहानियाँ और कुछ कवितायें पढ़ डाली। पढ़ने के बाद काफी निराशा हुई, दो-तीन विचार आए दिमाग में जो यहाँ share करना चाहता हूँ:

  1. 10-12 पेज की कहानियाँ थी, पर काफी कमजोर। एक का climax ये था की एक साहब हो बाबा ने कहा, पीना छोड़ दो, फिर उन्हे पता चला बाबा तो गाँजा लेते हैं, तो वे फिर पीने लगे शान से। एक लिव-इन relation की कहानी थी जो बड़े ही predictable अंदाज़ में चलती रही और फिर खतम हो गयी। अच्छी कहानियाँ या तो अपनी भाषा शैली से आपको बांधती हैं, या फिर अपनी विचार-कुसलता से, या फिर क्लाइमैक्स या conflict की गहराई से। कुछ भी बही मुला मुझे इन कहानियों में।
  2. 2-3 कवितायें पढ़ी पर कुछ समझ नहीं आया! शायद मैं पुरानी अच्छी कविताओं से spoilt हूँ, पर नयी अच्छी कवितायें अवश्य होंगी, ऐसी मेरी आशा है, पर यहाँ कुछ न मिला।
  3. शब्दों का चयन इन कहानियों में बड़ा विचित्र था – या तो संस्कृत-निष्ठ या फिर इतना देसी कि लोगों को पता ही न चले कि किस प्रांत से आया है। मैं समझता हूँ मेरी भाषा अच्छी है, और शब्द-ज्ञान भी ठीक-ठाक है, अगर मुझे समझने में इतनी दिक्कत हो रही थी तो कई लोगों को समस्या होगी।

जब भी मैं हिन्दी की दशा के बारे में सोचता था, ऐसा लगता था कि लोग हिन्दी में लिखते नहीं हैं, इसलिए लोग पढ़ते नहीं है, और इसलिए हिन्दी का प्रचार-प्रसार कम हो रहा है। इसीलिए इतने हिन्दी magazines को देख कर मैं दुकान पर दंग रह गया था।

इसी बीच मैं 2-3 हिन्दी नाटक देखने भी गया, और एक नाटक की किताब भी खरीदी। नाटक-घर छोटा था पर खचा-खच भरा था। किताब पढ़ा तो बड़ी आसानी से समझ आता गया। इसलिए ऐसा नहीं है कि लोग हिन्दी में रुचि नहीं रखते। नाटक की भाषा बिलकुल हिन्दी थी पर बिलकुल आसान। जो magazines मैंने पढे और इन नाटकों की भाषा में गहरा अंतर दिखा, जबकि दोनों हिन्दी हैं। magazine की भाषा ऐसे लगी जैसे victorian इंग्लिश, नाटक की भाषा जैसे मॉडर्न इंग्लिश।

अब लगता है की समस्या ये नहीं है की लेखन नहीं होता, समस्या शायद ये है की भाषा का प्रयोग वैसा नहीं है जैसी लोगों को समझ आए। हर भाषा समय के साथ बदलती है, और बोल-चाल की भाषा और लिखने की भाषा में बहुत ज्यादा अंतर नहीं हो सकता। और जब होता है, तो भाषा के ऊपर विपत्ति आ जाती है। हिन्दी के साथ भी शायद यही समस्या है। मुझे लगता है हिन्दी को भी आवश्यकता है चेतन भगत जैसे लेखक कि जिसने इंग्लिश क्लाससिक्स की दुनिया में भले जगह नहीं बनाई हो, पर जन-मानस में और लाखों युवाओं को पुस्तक-प्रेमी बना दिया, ऐसे युवा भी, जिनको आप कहीं से भी इंग्लिश-एक्सपेर्ट नहीं मान सकते।

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